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6. नैतिक विकास का सिद्धांत Moral Development Theory-1936 America

Learning By Mj

नैतिक विकास का सिद्धांत


नैतिक विकास का सिद्धांत- लाॅरेन्स कोहलबर्ग ( Moral Development Theory-1936 America)

Moral- शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के Morus शब्द से हुई इसका अर्थ- नैतिक आचरण है। अर्थात् 'सभ्य आचरण को ही नैतिकता करते हैं।

🔹️ लॉरेंस कोहलबर्ग ने हाइनीज नामक यूरोपियन व्यक्ति की दुखद घटना से प्रभावित होकर नैतिकतावादी विचारधारा का प्रतिपादन किया और 1936 में इस सिद्धांत को प्रस्तुत किया।

🔹️ इन्होंने बालक के जन्म से लेकर वयस्क अवस्था तक में नैतिक गुणों का अध्ययन करके नैतिक विकास के तीन स्तर दिए-

1. पूर्व परंपरागत /पूर्व रीत्यकाल/ पूर्व रूढ़िगत स्तर- Pre-Conventional Stage- Age 4-10 वर्ष 
यह नैतिक विकास का पहला स्तर है जो शैशवावस्था से लेकर बाल्यावस्था के मध्य तक चलता है इसमें नैतिक गुण नहीं पाए जाते हैं और बालक को इनके वास्तविक स्वरूप का ज्ञान भी नहीं होता है।  इस स्तर के दो उपस्तर हैं-
🔸️पहला भाग- आज्ञा एवं दंड उन्मुक्तता/ उपस्कर
🔸️ दूसरा भाग- अंहकार/ साधनात्मकता/ सापेक्षवादी।

🔹️आज्ञा एवं दंड उन्मुखता उपस्तर बालक में भय की अधिकता होती है अतः वह दंड के भय से माता-पिता एवं बड़ों की आज्ञा का पालन करता है किंतु उसमें नैतिक गुण नहीं पाए जाते हैं।

🔹️अंहकार/ साधनात्मक सापेक्षवादी उन्मुखता उपस्तर - इसमें भी नैतिक गुण नहीं पाए जाते हैं। बालक विद्यालय जाना आरंभ कर देता है। उसमें अहम् की भावना उत्पन्न हो जाती है। उसे यह अनुभव होता है कि मैं जो कर रहा हूं वह मेरे लिए अच्छा है, दूसरे जो कर रहे हैं वह उनके लिए अच्छा है। वह स्वयं को अपने विचारों की तरफ ही ले जाना चाहता है।


2. परंपरागत/ रीत्यकाल/ रूढ़िगत स्तर- Conventional Stage- (Age - 10-14 वर्ष) 
यह नैतिक विकास का दूसरा स्तर है जो बाल्यावस्था के मध्य से किशोरावस्था के मध्य तक चलता है। इस स्तर में ही "नैतिक गुण" उत्पन्न होते हैं और बालक को इनके वास्तविक स्वरूप का ज्ञान भी हो जाता है। अत: इसे नैतिक विकास का सर्वश्रेष्ठ स्तर करते हैं। इस स्तर के दो उपस्तर हैं-
I. प्रशंसा/स्वयं उत्तम बनने का उप स्तर-
इस उपस्तर में ही नैतिक गुण उत्पन्न होते हैं और बालक में प्रशंसा प्राप्त करने की प्रबल भावना पाई जाती है। वह स्वयं को उत्तम बनाने के लिए नैतिक गुणों का प्रदर्शन करता है और उसमें धीरे-धीरे नैतिक गुण उत्पन्न हो जाते हैं। कभी-कभी माता-पिता को खुश करने के लिए अथवा परिवार के बड़े व्यक्तियों के समक्ष प्रशंसा प्राप्त करने के लिए भी वह नैतिक गुणों का प्रदर्शन करता है।

II. सामाजिक अनुरूपता/समाज के अनुसार बनाने का उन्मुखता स्तर- 
यह नैतिक विकास का सर्वश्रेष्ठ उप स्तर है इस उप स्तर में ही बालक को नैतिक गुणों के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होता है। बालक समाज में सर्वाधिक नैतिक गुणों का प्रदर्शन इसी उपस्थिति में करता है। लेकिन कभी-कभी वह स्वयं को हानि पहुंचाने लगता है, क्योंकि उसमें निर्णय करने की क्षमता नहीं पाई जाती है।

3. उत्तर परंपरागत/ उत्तर रीत्यकाल/ उत्तर रूढ़िकाल स्तर - Post Conventional Stage- (Age- 14 से अधिक) 
यह नैतिक विकास का तीसरा स्तर जिसमें बुद्धि का पूर्ण विकास हो जाता है। व्यक्ति नैतिक नियमों का निर्माण करने लगता है और दूसरों को पालन करने के लिए भी प्रेरित करता है। यह किशोरावस्था के मध्य से लेकर वयस्क अवस्था तक चलने वाला स्तर है ।
इसके भी दो उपस्तर है-
I. सामाजिक अनुबंध /विवेक उन्मुखता स्तर- 
इस उप स्तर में 'बुद्धि का पूर्ण विकास' हो जाता है। निर्णय करने की क्षमता विकसित हो जाती है। बालक समाज से अनुबंध (जुड़ना) होकर उचित समय व उचित अवसर पर ही नैतिक गुणों को प्रदर्शित करता है। अब वह स्वयं को हानि नहीं पहुंचाता है।

II. सार्वभौमिक /नीतिपरक /सामाजीकरण उन्मुखता स्तर-
इस अवस्था में बालक स्वयं तो नैतिक नियमों का पालन करता है, साथ ही दूसरों को भी पालन करने के लिए प्रेरित करता है। धीरे-धीरे वह स्वयं नैतिक नियमों का निर्माण भी करता है।



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