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मनोसामाजिक विकास का सिद्धांत - ईरीक एरिक्सन (ऑस्ट्रिया )
1. अहम विकास का सिद्धांत
2. जीवन अवधि का सिद्धांत
* नवफ्रायडवादी विचारधारा - एरिक्सन
| क्र.सं. | मनोसामाजिक विकास की अवस्थाएं | उम्रसीमा | उपनाम |
|---|---|---|---|
| 1. | विश्वास बनाम अविश्वास | 0-1 | शैशवावस्था |
| 2. | स्वायत्त/स्वतंत्रता बनाम शर्म | 1-3 | प्रारंभिक अवस्था |
| 3. | पहल बनाम अपराध बोध पहल बनाम अपराधी | 3-6/3-5 | खेल की अवस्था |
| 4. | परिश्रम बनाम हीन भावना | 6-12/5-12 | विद्यालय की अवस्था |
| 5. | पहचान बनाम पहचान भ्रांति/संकट | 12-18 | किशोरावस्था |
| 6. | आत्मीयता बनाम अलगाव | 20-30 | तरुण अवस्था |
| 7. | जनेन्द्रयात्मकता बनाम स्थिरता | 40-60/64 | वयस्कावस्था/उत्तरतरूणावस्था |
| 8. | सम्पूर्णता बनाम निराशा | 64-मृत्युतक | परिपक्वता |
🔸️ऐरिक्सन सिगमंड के शिष्य थे इन्होंने व्यक्तित्व के सिद्धांत का अध्ययन करके 'अहम' प्रकार को ध्यान में रखते हुए इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
🔸️ इन्होंने नवफ्रायडवादी विचारधारा का प्रतिपादन किया जिसके अंतर्गत सामाजिक, संवेगात्मक, संज्ञानात्मक एवं नैतिक विकास को ध्यान में रखते हुए 'मनोसामाजिक विकास' के सिद्धांत को दिया
🔸️ यह सिद्धांत व्यक्ति में सामाजिक गुणों के विकास को द्वन्द्व के रूप में स्पष्ट करता है।
🔸️ एरिक्सन ने मानव के जन्म से लेकर मृत्यु तक के विकास का अध्ययन करके संपूर्ण जीवन अवधि को ध्यान में रखते हुए मनोसामाजिक विकास की आठ अवस्थाएं प्रस्तुत की जो निम्न है।
1. विश्वास बनाम अविश्वास (जीरो से एक वर्ष )- बालक अपने माता पिता एवं परिवार के सदस्यों पर विश्वास और अपरिचितों पर अविश्वास प्रकट करता है । कभी-कभी माता-पिता के नकारात्मक व्यवहार पर भी वह अविश्वास प्रकट करता है।
2. स्वायत्त / स्वतंत्रता बनाम शर्म( 1 से 3 वर्ष) - बालक एकांत में रहने का प्रयास करता है जहां वह स्वतंत्रता का अनुभव करता है यदि उस पर बंधन लगाए जाते हैं तो उसमें शर्म की प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है और भविष्य में उसका व्यक्तित्व अंतर्मुखी हो जाता है ।
3. पहल बनाम अपराध बोध (3 से 6 वर्ष) - बालक घर से बाहर खेलने की पहल करता है किंतु उसमें भय अधिक होता है अतः वह इस द्वंद्व में रहता है कि मुझसे कोई अपराध ना हो जाए।
4. परिश्रम बनाम हीन भावना (6 से 12 वर्ष)- बालक विद्यालय जाना आरंभ कर देता है। विद्यालय में कठिन परिश्रम करता है किंतु कभी-कभी असफल होने पर उसमें हीन भावना उत्पन्न हो जाती है कि वह कैसे सफल होगा।
5. पहचान बनाम पहचान भ्रांति/ संकट (12 से 18 वर्ष) - बालक सामाजिक नियमों का पालन करता है वह पहचान बनाने के लिए अच्छे गुणों का प्रदर्शन करता है किंतु समाज में कभी-कभी वह ऐसा अनुभव करता है कि उसकी क्या पहचान?, वह कौन है? आदि।
6. आत्मीयता बनाम अलगाव (20 से 30 वर्ष)- इसे सच्ची दोस्ती, सच्ची दुश्मनी की अवस्था भी कहते हैं। व्यक्ति अपने दोस्तों के प्रति आत्मीयता का लगाव रखता है किंतु किसी भी नकारात्मक व्यवहार से वह उनसे हमेशा के लिए भी अलग हो जाता है।
7. जननेन्द्रियता बनाम स्थिरता (40 से 60/64 वर्ष)- इस अवस्था से व्यक्ति अपनी अगली पीढ़ी के बारे में चिंतन करना प्रारंभ कर देता है । वह अपने बच्चों के विकास के लिए उनको आत्मनिर्भर करने के लिए प्रयास करता है ।उसमें यह द्वन्द्व होता है कि वह कैसे सफल होंगे। कभी कभी असफलता नजर आने पर उसके विचारों में स्थिरता आ जाती है।
8. संपूर्णता बनाम निराशा (64 से मृत्युतक) - व्यक्ति अपने संपूर्ण जीवन का लेखा-जोखा तैयार करता है। वह अपने बुरे कार्यों पर पश्चाताप करता है किंतु निराशा नजर आती है और उसकी मृत्यु हो जाती है।

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