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7. मनोलैंगिक विकास का सिद्धांत सिगमंड फ्रायड| Pscho-Sexual Development Theory-1900 Sigmund Frayad

Learning By Mj

🟣 मनोलैंगिक विकास का सिद्धांत - सिगमंड फ्रायड
Pscho-Sexual Development Theory-1900 Sigmund Frayad 

सिगमंड फ्रायड वियाना ऑस्ट्रिया के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक थे। हीस्टीरिया नामक बीमारियों पर कार्य किया और इन्हें मनोशारीरिक बीमारी के रूप में व्यक्त किया। इन बीमारियों का संबंध मूल प्रवृत्ति से स्थापित किया और दो प्रकार की मूलप्रवृत्तयों का विवरण दिया।

🔸️जीवन मूल प्रवृत्ति (इरोस) 
🔸️मृत्यु मूल प्रवृत्ति (थैनाटोस)

इन्होंने, इन ग्रंथियों का संबंध मूल प्रवृत्तियों से संबंध, भावात्मक ग्रंथियों से स्थापित करते हुए तीन प्रकार की भावात्मक ग्रंथियों का विवरण दिया।

(1) पितृ विरोधी भावना ग्रंथि (ऑडीपस) - बालक
(2) मातृ विरोधी भावना ग्रंथि (इलेक्ट्रा) - बालिका
(3) आत्म-प्रेम संबंधी भावना ग्रंथि (नर्सिज्म/नरसिस) - बालक-बालिका।

इन भावनात्मक ग्रंथियों का ध्यान में रखते हुए सिगमंड फ्रायड ने कामुक-क्षेत्र /कामुकता के आधार पर मनोलैंगिक विकास की पांच अवस्थाएं दी जो निम्न प्रकार है-


क्र. सं. अवस्थाएं उम्रसीमा कामुकक्षेत्र विशेषताएं
1. मुखीय/मुखावस्था 0-2 वर्ष  मुख चूसने की प्रवृत्ति, स्वाद इंद्रियों की प्रबलता जैसे- रेत, राख, सब का स्वाद।
2. गुदीय/गुदावस्था 2-3 वर्ष गुदा बार बार मल-मूत्र त्यागना, आक्रामकता व धारणात्मकता तथा प्रदर्शन करना।
3. लैंगिक/ लिंग प्रधान अवस्था 3-6 वर्ष जननेन्द्रिय लिंग विभेद का ज्ञान। जैसे- गुड्डा गुड्डी के खेल खेलना।
4. अव्यक्त/ सुषुप्तावस्था 6-12 वर्ष ज्ञात नहीं  कामुकता में न्यूनता, काम-क्षेत्र का निर्धारण नहीं हो पाता, समलिंगीय समूह बनाकर खेलना।
5. जननेंद्रिय अवस्था 12-18 वर्ष तक समस्त जननेंद्रिय  सर्वश्रेष्ठ अवस्था समस्त जननेंद्रिय पूर्ण विकसित। संतान उत्पत्ति संबंधी गुण विकसित।


🔵मनोसांस्कृतिक विकास का सिद्धांत (Psycho Cultural Development-1920) (लेव-सिमकोविच वाइगोत्सकी )

1. निकट विकास के क्षेत्र का सिद्धांत
2. सामाजिक अन्तःक्रिया का सिद्धांत
3. संज्ञानात्मक सामाजिक विकास का सिद्धांत

🔹️यह एक प्रकार का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत है जो सामाजिकता पर आधारित है अत: इसे संज्ञानात्मक सामाजिक विकास का सिद्धांत भी करते हैं।

🔹️ इस सिद्धांत के अनुसार बालक में संज्ञानात्मक विकास अधिगम द्वारा ही संभव है संज्ञात्मक विकास का मुख्य कारक संस्कृति है।

🔹️ बालक में सामान्यतः संज्ञानात्मक विकास सामाजिक अंत:क्रिया के माध्यम से होता है। बालक समाज के जिस पक्ष से अंत:क्रिया करता है, उस पक्ष से संबंधित गुण उसमें उत्पन्न हो जाते हैं।

🔹️ बालों के निर्देशन यदि कोई कार्य करता है स्वतंत्र होकर उसी कार्य को करता है तो इन दोनों कार्यों के मध्य 'संभाव्य क्षेत्र निर्मित होता है, अर्थात्‌ यह एक निर्माण कार्य सिद्धांत है, और इन दोनों कार्यों के मध्य के अंतर को "निकट विकास का क्षेत्र" (Z.P.D.) जोन ऑफ प्रॉक्सिमल डेवलपमेंट कहते हैं।

🔹️ बालक ने भाषा एवं चिंतन का विकास अलग-अलग होता है जो आगे चलकर एक हो जाते हैं भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है बल्कि भाषा से ही बालक का समाज में व्यक्तित्व व्यवहार और गुणों का निर्धारण होता है । बालक भाषा से ही समाज से अंत:क्रिया करता है।

🔶️ मनोसास्कृतिक विकास के संप्रत्यय-
1. संज्ञानात्मक विकास का मुख्य कारक संस्कृति है।
2. संज्ञानात्मक विकास अधिगम द्वारा ही संभव है।
3. बालक में संज्ञानात्मक विकास सामाजिक अंत:क्रिया से होता है।
4. संज्ञानात्मक विकास की कल्पना केवल अमूर्त सिद्धांतों के आधार पर नहीं की जा सकती है।
5. व्यक्ति की वास्तविक कार्य क्षमता एवं कार्यकारी कार्यक्षमता के बीच की दूरी को निकट विकास का क्षेत्र कहते हैं।

🔷️ खेल का महत्त्व-
वाइगोत्सकी ने मनोसामाजिक विकास में खेल को विशेष महत्व दिया है।

1. खेल बालक का सर्वाधिक भावनात्मक विकास होता है।
2. ध्यान केंद्रित करने की क्षमता विकसित होती है।
3. मानसिक थकान दूर होती है।
4. निकट विकास के क्षेत्र का निर्माण होता है।
5. संस्कृति और सभ्यता का विकास होता है।
6. बालक में संज्ञानात्मक सामाजिक गुण विकसित हो जाते हैं।

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