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बाल विकास एवं बाल विकास के सिद्धांत ( Child Development and Principal of Child Development)
बाल मनोविज्ञान- बाल विकास शब्द का सबसे पहले प्रयोग रिपब्लिक नामक पुस्तक में किया गया जिसकी रचना 427 ई.पू. से 400 ईसवी पूर्व प्लेटो ने की थी अतः बाल विकास अथवा बाल मनोविज्ञान का जनक कहा गया।
* 17वीं सदी में केमेनियस ने धनी वर्ग के बच्चों के लिए इटली में स्कूल ऑफ इन्फैंसी (School of Infancy) नामक एक संस्था स्थापित की।
* सन् 1628 ई. में इसी नाम की एक पुस्तक में इन बच्चों के विकास का विवरण दिया।
*सन् 1659 ई. में केमेनियस ने अपनी सर्वश्रेष्ठ पुस्तक नैतिक आचरण (Orbic Victous ) की रचना की। जिसमें सभी वर्ग के विकास का विवरण दिया।
*18 वीं सदी में स्विट्जरलैंड के मनोवैज्ञानिक पेस्टोलॉजी ने अपने 3½ वर्ष के पुत्र के बाल विकास का क्रमबद्ध अध्ययन किया और बेबी ग्राफी (Baby Graphy) नामक पत्रिका में बाल विकास का वैज्ञानिक विवरण दिया।
अतः 18 वीं सदी से मनोविज्ञान दो भागों में विभाजित हो गया (1) दार्शनिक विचारधारा (2) वैज्ञानिक विचारधारा
(1) दार्शनिक विचारधारा - इसके जनक अरस्तू है, किंतु इसका सर्वाधिक विकास जॉन लॉक ने किया था जिसके अनुसार बाल विकास आत्मा-परमात्मा की देन है।
(2) वैज्ञानिक विचारधारा - इसके जनक पेस्टोलॉजी है। वर्तमान में यही विचारधारा मान्य है जिसके अनुसार बाल विकास वंशानुक्रम एवं वातावरण की देन है।
* 19 वीं सदी में अमेरिका में बाल विकास आंदोलन चला जिसके अंतर्गत प्रसिद्ध अमेरिकी मनोवैज्ञानिक स्टेनले हॉल ने चाइल्ड स्टडी सोसाइटी(Child study Sociaty) की स्थापना की और स्टेनले हॉल ने बाल विकास का व्यापक अध्ययन किया अतः इन्हें बाल अध्ययन का जनक कहा गया।
*20वीं सदी में सन 1903 में बर्लिन (जर्मनी) में बाल विकास पर एक अंतरराष्ट्रीय बैठक आयोजित की गई इस बैठक में बाल विकास के लिए पहली बार बाल मनोविज्ञान शब्द का प्रयोग किया गया और मनोवैज्ञानिक शाखा के रूप में इसे शामिल किया गया।
बाल मनोविज्ञान की परिभाषाएं (Definition of Child Psychology) -
*भारत में बाल मनोविज्ञान का आगमन सन् 1930 में कोलकाता विश्वविद्यालय में हुआ।
* गीजू भाई ने बाल विकास का सर्वाधिक विकास किया इन्हें मूछों वाली माता के नाम से भी जाना जाता है।
परिभाषाएं -
*क्रो & क्रो के अनुसार: - " बाल-विकास को बाल मनोविज्ञान करते हैं।
*क्रो & क्रो के अनुसार: - "20वीं शताब्दी बालक की शताब्दी है।"
*क्रो & क्रो के अनुसार: - " बाल-मनोविज्ञान मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसमें बालक के विकास का गर्भावस्था से लेकर के किशोरावस्था तक का अध्ययन किया जाता है।
*जीन पियाजे के अनुसार: - " बालक के विकास का नियंत्रित परिस्थितियों में किया गया अध्ययन ही बाल मनोविज्ञान है।
*जेरोम एस.ब्रूनर के अनुसार: - "बाल-मनोविज्ञान सामाजिक परिस्थितियों में बालक की संरचनात्मक विकास का अध्ययन है।
वंशानुक्रम एवं वातावरण (Heredity and Environment)
*वंशानुक्रम एवं वातावरण- मानव का जीवन वंशानुक्रम एवं वातावरण की देन है सामान्यतः यह माना जाता है कि मानव के विकास में 90% वंशानुक्रम और 10% वातावरण का योगदान होता है।
*वुडवर्थ के अनुसार- विकास = वंशानुक्रम × वातावरण/ व्यक्त्वि (Pesonlity) = व्यवहार (Behavior) × वातावरण (Environment) अर्थात् P = B × E
सामान्यत: मानव का जीवन एक कोष से आरंभ होता है और आगे चलकर बहुकोषीय से प्राणी बन जाता है। मनुष्य में 22 + XX महिला एवं 22 + XY पुरूष अर्थात् कुल 23 जोड़ी गुणसूत्र पाए जाते हैं लिंक करने दें उसके गुण सूत्रों से ही होता है इन गुणसूत्रों के केंद्र में जीन पाए जाते हैं मनुष्य के शरीर में असंख्य जीन होते है। जीन हमारे गुणों के वाहक होते हैं।
जो जीन वातावरण के प्रभाव से अधिक सक्रिय हो जाते हैं वह गुण मनुष्य में विकसित हो जाते हैं और जो जीन कम सक्रिय होते हैं वह गुण विलुप्त हो जाते हैं अथवा कम प्रदर्शित होते हैं।
उनकी सक्रियता के आधार पर वंशानुक्रम के नियम निर्मित किए गए।
वंशानुक्रम एवं वातावरण के नियम (Laws of Inheritance and Environment)
1. समानता का नियम - (सोरेन्सन व डार्विन) -
जब माता पिता के समान लक्षण बच्चों में उत्पन्न हो जाते हैं तो इसे समानता का नियम करते हैं।
जैसे:- "गोरे माता-पिता की संतान का गोरा होना।"
"प्रतिभाशाली की संतान का प्रतिभाशाली होना।"
2. विभिन्नता का नियम - (लैमार्क व डार्विन) -
जब माता-पिता से भिन्न लक्षण बच्चों में उत्पन्न हो जाते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी उनका स्थानांतरण होता रहता है तो इसे ही विभिन्नता का नियम कहते हैं।
जैसे - "जिराफ की गर्दन का लंबा होना।"
"मनुष्य में करण पल्लव का विलुप्त होना।"
3. प्रतिगमन या प्रत्यावर्तन का नियम - डार्विन -
जब माता-पिता से मिलने लक्ष्मी बच्चों में उत्पन्न हो जाते हैं किंतु पीढ़ी दर पीढ़ी उनका स्थान तक नहीं होता है
जैसे - "अध्यापक की संतान का डॉक्टर बनना।"
"एक सामान्य व्यक्ति की संतान का विकलांग होना।"
वंशानुक्रम के सिद्धांत(Principles of Inheritance)
1. जीव सांख्यिकी का सिद्धांत(Theory of Biostatistics)- फ्रांसिस गाल्टन: -
बच्चों में गुणसूत्रों का वितरण ½ माता-पिता से ¼ दादा/दादी, नाना/नानी से ⅛ परदादा/परदादी, परनाना परनानी से 1 बटा 16 अन्य पीढ़ियों से होता है।
इन गुणसूत्रों के प्रभाव से ही भिन्नता प्रदर्शित होती है अतः इन्हें वैयक्तिक भिन्नता अथवा सुजननशास्त्र का जनक भी कहते हैं।
2. उपार्जित गुणों के अवितरण का सिद्धांत(The rinciple of distribution of acquired properties) - बीजमैन व ल्यूवेनहाॅक: -
यदि वातावरण के प्रभाव से बच्चों में कोई उपार्जित गुण उत्पन्न हो जाता है, तो उसका वितरण पीढ़ी दर पीढ़ी होने आवश्यक नहीं है।
जैसे- "चूहे की पूंछ को काट कर देखा तो वापस आ गई।"
3. उपार्जित गुणों के संक्रमण का सिद्धांत(Theory of Transition of Acquired Properties)- लैमार्क
यदि वातावरण के प्रभाव से बच्चों में कोई उपार्जित गुण उत्पन्न हो जाता है तो पीढ़ी दर पीढ़ी उसका स्थानांतरण होता रहता है।
जैसे- "जिराफ की गर्दन का लंबा होना।"
4. बीज कोष की निरंतरता का सिद्धांत- बिजमैन
बीजकोष का प्रभाव कभी नष्ट नहीं होता है यह पीढ़ी दर पीढ़ी निरंतर चलता रहता है।
जैसे- "एक गोत्र के वर-वधू का विवाह नहीं होना, हो भी गया तो उनकी प्रथम संतान का मरना।"
5. भाषा विकास का सिद्धांत- चौमोस्की
बालक में भाषा का विकास वंशानुक्रम एवं वातावरण के प्रभाव से होता है, बालक की पहली भाषा क्रंदन है, फिर बालक सांकेतिक भाषा को ग्रहण करता है लगभग छः माह भाद कुछ अस्पष्ट ध्वनियाँ व्यंजन- व, म, ल, ह, द आदि बोलने लगता है।
एक पर्स में बालक लगभग 3 शब्दों को शुद्ध रूप में बोल लेता है और 2 वर्ष में लगभग 100 शब्दों को बोलना सीख जाता है बालक सबसे पहले व्यंजन, फिर स्वर, फिर शब्द बोलना सीखता है।
बाल विकास के सिद्धांत( Principles of Child Development) -
1. संवेगात्मक विकास का सिद्धांत- विलियम मैक्डूगल ‐1908 (अमेरिका)
2. मनोसामाजिक विकास का सिद्धांत- एरिक एरिक्सन-1952 ( ऑस्ट्रिया)
3. नैतिक विकास का सिद्धांत- लाॅरेन्स कोहलबर्ग -1936 (अमेरिका)
4. मनोलैंगिक विकास का सिद्धांत- सिग्मड फ्रायड-1900 (वियाना)
5. मनो-सांस्कृतिक विकास का सिद्धांत- लेव सिमकोविच वाइगोत्सकी-1920 (रूस)
6. अभिवृद्धि व विकास के सिद्धांत-
इनका अध्ययन आगे करते हैं।

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