Ticker

10/recent/ticker-posts

4. संवेगात्मक विकास का सिद्धांत- विलियम मैक्डूगल|Theory of Emotional development

Learning By Mj

1. संवेगात्मक विकास का सिद्धांत (Theory of Emotional) - विलियम मैक्डूगल 

Theory of Emotional


संवेग की उत्पत्ति व विकास - 1908 में इमोशनल डेवलपमेंट थ्योरी की रचना अमेरिका में की।
       Emotion शब्द की उत्पत्ति लेटिन भाषा के Emover शब्द से हुई जिसका अर्थ उत्तेजना अथवा उत्तेजित अवस्था है अतः उत्तेजना की स्थिति को ही संवेग करते हैं।
 
वुडवर्थ- "व्यक्ति की उत्तेजित अवस्था को ही संवेग कहते हैं।"

जे. बी. वाटसन- "व्यक्ति की भावनात्मक उत्तेजना को ही संवेग कहते है।"

विलियम मैक्डूगल- "मूल प्रवृत्तियों के प्रभाव से उत्पन्न उत्तेजना को संवेग कहते हैं।"

अरस्तू- "क्रोध करना बहुत आसान है किंतु उचित समय पर, उचित मात्रा में, उचित व्यक्ति पर, उचित प्रयोजन हेतु क्रोध करना आसान नहीं है।"

संवेगो के प्रकार- संवेग दो प्रकार के होते हैं।
1. सकारात्मक संवेग- ऐसे शब्द जो उत्पन्न होने पर स्वयं को अथवा किसी अन्य को किसी भी प्रकार से हानि नहीं पहुंचाते हैं, सकारात्मक से कहलाते हैं। 
जैसे- दया, प्रेम, हर्ष, आमोद आदि।

2. नकारात्मक संवेग- ऐसे संवेग जो उत्पन्न होने पर स्वयं को अथवा किसी अन्य को किसी न किसी प्रकार से हानि अवश्य पहुंचाते हैं नकारात्मक संवेग कहलाते हैं। 
जैसे- भय, क्रोध, कष्ट, घृणा, हिंसा आदि।


संवेगों की संख्या व प्रकार 

1.भारतीय विद्वानों के अनुसार - 2 प्रकार 
(1)  रागात्मक संवेग  (2) द्वेषात्मक संवेग

2. विलियम जेम्स के अनुसार- 2 प्रकार
(i) स्थूल संवेग (ii) सूक्ष्म संवेग

3. सिग्मड फ्रायड के अनुसार- 2 प्रकार
(1) जीवन संवेग (इरोस)    (2) मृत्यु संवेग (थैनाटोस)

4. गिलफोर्ड के अनुसार इन्होंने संवेगों को 3 वर्गों में विभक्त किया 
(1) प्राथमिक संवेग (2) गौण संवेग (3) कृत्रिम संवेग ।

5. जे. बी. वाटसन के अनुसार- इन्होंने संवेगों की संख्या तीन निश्चित की है जिन्हें प्राथमिक संवेग कहते हैं।
(i) भय ,   (ii) प्रेम  ,   (iii) क्रोध। 

6. मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुसार- इनके अनुसार संवेगों की संख्या 4 है, जिन्हें प्राथमिक संवेग करते हैं।
 (1)भय  (2) प्रेम  (3)क्रोध (4)  कष्ट।

7. गेट्स के अनुसार- इनके अनुसार संवेगों की संख्या 5 बताई गई है जो इस प्रकार है 
(1) भय (2) प्रेम। (3) क्रोध। (4) दया  (5)कामुकता।

8. वुडवर्थ के अनुसार- इनके अनुसार संवेगों की संख्या 24 है इन्हें संवेग का उपजनक भी कहते हैं।

9. विलियम मैक्डूगल के अनुसार-  इनके अनुसार संवेगों की संख्या 14 है, जो सर्वमान्य है। अतः इन्हें संवेग का जनक कहत हैं।

मूलप्रवृत्तियां व संवेग निम्न प्रकार है- 

मूलप्रवृत्तियां                          संवेग 
1. देन्य/विनीत भाव               -  अधीनता  
2. संचय/संग्रह प्रवृत्ति            -  अधिकार भावना
3.हास                                -  आमोद
4. जिज्ञासा/ उत्साह               -  आश्चर्य 
5. संवेदना/वेदना                   -  कष्ट/ करूणा
6.  युयुत्सा/ युद्धप्रियता           -  क्रोध 
7. रचनात्मकता/सृजनात्मकता -  कृतिभाव 
8. काम प्रवृत्ति एवं यौन प्रवृत्ति  -  कामुकता 
9. पलायन                            -  भय
10. भोजन अन्वेषण               -  भूख
11. अप्रियता/ निवृत्ति              -  घृणा
12. शिशु प्रेम/वात्सल्यता         -  वात्सल्य
13. सामूहिकता                     -  एकाकीपन
14. आत्म प्रदर्शन/आत्म स्थापन/आत्म गौरव-  श्रेष्ठता की भावना  ।
         
Note: इन संवेगों में मानव का प्रथम भय संवेग है तथा यह सर्वश्रेष्ठ संवेग कहलाता है।


 संवेगों की विशेषताएं (Definition of Emotios)

  1. संवेग जन्मजात होते हैं क्योंकि शिशु में जन्म से ही उत्तेजना पाई जाती है, किंतु इनका प्रभाव जन्म के 2 माह बाद स्पष्ट होता है।
  2. संवेगों की प्रकृति लचीली होती है।
  3. संवेग अचानक उत्पन्न होते हैं।
  4. संवेगों को की उत्पत्ति मनोशारीरिक होती है।
  5. संवेगों का स्थानांतरण हो जाता है।
  6. संसार के प्रत्येक जीव में कोई ना कोई संवेग अवश्य पाए जाते हैं।
  7. संवेग कभी नष्ट नहीं होते हैं।
  8. संवेगों का प्रभाव अवस्थाओं के अनुसार अथवा लिंग के अनुसार भिन्न भिन्न होते हैं अर्थात संवेग लिंगीय विभेद करते हैं।
  9. संवेग कभी-कभी हमारी रक्षा/ सुरक्षा भी करते हैं।
  10. संवेग मूल प्रवृत्तियों के प्रभाव से उत्पन्न होते हैं। 


संवेगों के प्रभाव अथवा उत्पत्ति से होने वाले शारीरिक परिवर्तन

  1. हकलना 
  2. तुतलाना
  3. पसीना आना
  4. शरीर में कंपन होना
  5. गला सूखना 
  6. आवाज भारी होना 
  7. आंखों का चौड़ा होना 
  8. आंखों का संक्रमित अथवा लाल होना
  9. कान का गर्म लाल होना 
  10. हृदय की गति का बढ़ जाना 
  11. श्वास का तीव्र होना 
  12. रोंगटे खड़े होना 
  13. पेट में डूबने का भाव उत्पन्न होना।


मूल प्रवृत्तियां (Basic Instinct)- 1908, विलियम मैक्डूगल

मूल प्रवृत्तियां - मूल प्रवृत्तियों की खोज 'बतख' पर प्रयोग करके सन् 1908 में विलियम मैक्डूगल ने की थी। उन्होंने इनकी संख्या 14 निश्चित की । मूल प्रवृत्तियों का जनक कहते हैं।

विलियम मैक्डूगल - ऐसी क्रियाएं जो बिना सीखे उत्पन्न हो जाती है जिन्हें सीखने की आवश्यकता नहीं होती है, मूल प्रवृत्तियां कहलाती है।
 
विलियम मैक्डूगल - "मूल-प्रवृत्तियां सम्पूर्ण व्यवहार का चालक है।"

वुडवर्थ- "मूल प्रवृत्ति बिना  सीखी हुई क्रियाएं हैं।"

* मूल प्रवृत्तियों की विशेषताएं- 
  1. यह भी जन्मजात होती है।
  2. इनकी उत्पत्ति मनोसामाजिक होती है।
  3. इनसे सामाजिक गुणों का विकास होता है।
  4. मूल प्रवृत्तियां भी कभी नष्ट नहीं होती है।
  5. अवस्थाओं के प्रभाव से अथवा शिक्षा से इनका परिमार्जन किया जा सकता है।
  6. मूल प्रवृत्तियां भी संसार के प्रत्येक जीव में पाई जाती है।
  7. मूल प्रवृत्तियों का संबंध भावनाओं से है।
  8. मूल प्रवृत्तियां आदत व्यवहार व स्वभाव से भिन्न होती है।

मूलप्रवृत्तियां व संवेग निम्न प्रकार है- 

मूलप्रवृत्तियां                          संवेग 
1. देन्य/विनीत भाव               -  अधीनता  
2. संचय/संग्रह प्रवृत्ति            -  अधिकार भावना
3.हास                                -  आमोद
4. जिज्ञासा/ उत्साह               -  आश्चर्य 
5. संवेदना/वेदना                   -  कष्ट/ करूणा
6.  युयुत्सा/ युद्धप्रियता           -  क्रोध 
7. रचनात्मकता/सृजनात्मकता -  कृतिभाव 
8. काम प्रवृत्ति एवं यौन प्रवृत्ति  -  कामुकता 
9. पलायन                            -  भय
10. भोजन अन्वेषण               -  भूख
11. अप्रियता/ निवृत्ति              -  घृणा
12. शिशु प्रेम/वात्सल्यता         -  वात्सल्य
13. सामूहिकता                     -  एकाकीपन
14. आत्म प्रदर्शन/आत्म स्थापन/आत्म गौरव-  श्रेष्ठता की भावना  ।

Post a Comment

0 Comments