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मुर्दहिया आत्मकथा- डॉ. तुलसीराम | Murdahiya -Dr. Tulasi Ram

Learning By Mj

Murdhiya

भूमिका

   'मुर्दहिया' हमारे गांव धरमपुर (आजमगढ़) की बहुद्देशीय कर्मस्थली थी। चरवाही से लेकर हरवाही तक के सारे रास्ते वहीं से गुजरते थे। इतना ही नहीं, स्कूल हो या दुकान, बाजार हो या मंदिर, यहाँ तक कि मजदूरी के लिए कलकत्ता वाली रेलगाड़ी पकड़ना हो, तो भी मुर्दहिया से ही गुजरना पड़ता था। हमारे गांव की 'जिओ-पॉलिटिक्स' यानी 'भू-राजनीति' में दलितों के लिए मुर्दहिया एक सामरिक केन्द्र जैसी थी। जीवन से लेकर मरन तक की सारी गतिविधियाँ मुर्दहिया समेट लेती थी। सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुर्दहिया मानव और पशु में कोई फर्क नहीं करती थी। वह दोनों की मुक्तिदाता थी। विशेष रूप से मरे हुए पशुओं के मांसपिंड पर जूझते सैकड़ों गिद्धों के साथ कुत्ते और सियार मुर्दहिया को एक कला-स्थली के रूप में बदल देते थे। रात के समय इन्हीं सियारों की 'हुआं-हुआं' वाली आवाज उसकी निर्जनता को भंग कर देती थी। हमारी दलित बस्ती के अनगिनत दलित हजारों दुख-दर्द अपने अंदर लिये मुर्दहिया में दफन हो गए थे। यदि उनमें से किसी की भी आत्मकथा लिखी जाती तो उसका शीर्षक 'मुर्दहिया' ही होता।

        मुर्दहिया सही मायनों में हमारी दलित बस्ती की जिंदगी थी। इस जिंदगी को मुर्दहिया से खोदकर बाहर लाने का पूरा श्रेय 'तद्भव' के मुख्य संपादक अखिलेश को जाता है। वे हमेशा मेरे सामने कलम के बदले फावड़ा लिये तैयार मिलते थे। सही अर्थों में मैंने उनके ही फावड़े से खोदकर 'मुर्दहिया' से अपनी जिंदगी को बाहर निकाला। जमाना चाहे जो भी हो, मेरे जैसा कोई अदना जब भी पैदा होता है, वह अपने इर्द-गिर्द घूमते लोक-जीवन का हिस्सा बन ही जाता है। यही कारण था कि लोकजीवन हमेशा मेरा पीछा करता रहा। परिणामस्वरूप मेरे घर से भागने के बाद जब 'मुर्दहिया' का प्रथम खंड समाप्त हो जाता है, तो गांव के हर किसी के मुख से निकले पहले शब्द से तुकबंदी बनाकर गानेवाले जोगीबाबा, लक्कड़ ध्वनि पर नृत्यकला बिखेरती नटिनिया, गिद्ध-प्रेमी पग्गल बाबा तथा सिंघा बजाता बंकिया डोम आदि जैसे जिन्दा लोक पात्र हमेशा के लिए गायब होकर मुझे बड़ा दुख पहुंचाते हैं। सबसे ज्यादा दुखित करने वाली बात दिल्ली में रह रहे मेरे गांव के कुछ प्रवासी मजदूरों से मालूम हुई। पचास-साठ साल पहले की जिस 'मुर्दहिया' का वर्णन मैंने किया है। वह पूर्णरूपेण उजड़ चुकी है। सारे जंगल कटकर खेत में बदल चुके हैं, जिसके चलते गिद्धों जैसे अनगिनत दुर्लभ पक्षियों तथा साही, सियारों और खरगोशों जैसे पशुओं का विलोप हो चुका है। बचपन में दुखित होने का मतलब होता या आंखों में आंसू आ जाना। ऐसे अवसरों पर मेरी दादी आंख धो लेने को कहती थी, किंतु आज का अनुभव बताता है कि चंद पानी के छींटों से दुख की निशानी नहीं मिट पाती। प्रवासी मजदूरों से ही पता चला कि 'मुर्दहिया' से होकर जानेवाली एक सरकारी सड़क ने हमारे गांव को तीन जिलों-आजमगढ़, गाजीपुर तथा बनारस से जोड़ दिया है। उत पर टैम्पो भी चलने लगे हैं। जिस तरह हमारे गांव से बड़ी संख्या में मजदूरों का पलायन बड़े शहरों में हो चुका है, संभवतः 'मुर्दहिया' से सड़क निकल जाने के कारण वहां के भूत-पिशाचों का भी पलायन अवश्य हो गया होगा। जाहिर है, अब पहले जैसी उनकी पूजा नहीं होती। बढ़ते हुए शहरीकरण ने हर एक के जीवन को प्रभावित किया है। भूत भी इससे अछूते नहीं हैं।
     
      आने वाले 'मुर्दहिया' के दूसरे खंड में घर से भागने के बाद कलकत्ता, बनारस तथा दिल्ली होते इंग्लैंड तया सोवियत संघ रसिया तक की जीवनयात्रा का लेखा-जोखा होगा। मूलतः यह यात्रा मार्क्सवाद से बौद्ध दर्शन की है। राजकमल प्रकाशन के निदेशक अशोक महेश्वरी इस बात के लिए धन्यवाद के पात्र हैं कि उन्होंने 'तद्भव' में अब तक प्रकाशित सात किस्तों को 'मुर्दहिया' (खंड-1) के रूप में अविलंब प्रकाशित करने का निर्णय लिया, जबकि आगे का लेखन अभी जारी है।
-डॉ. तुलसी राम
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
नई दिल्ली-110067

अनुक्रम

    भूमिका - 5
1. भुतही पारिवारिक पृष्ठभूमि - 9
2. मुर्दहिया तथा स्कूली जीवन - 22
3. अकाल में अंधविश्वास - 52
4. मुर्दहिया के गिद्ध तथा लोकजीवन - 82
5. भुतनिया नागिन - 116
6. चले बुद्ध की राह - 142
7. आजमगढ़ में फाकाकशी - 164



भुतही पारिवारिक पृष्ठभूमि



        मूर्खता मेरी जन्मजात विरासत थी। मानव जाति का वह पहला व्यक्ति जो जैविक रूप से मेरा खानदानी पूर्वज था, उसके और मेरे बीच न जाने कितने पैदा हुए, किन्तु उनमें से कोई भी पढ़ा-लिखा नहीं था। लगभग तेईस सौ वर्ष पूर्व यूनान देश से भारत आए मिनांदर ने कहा कि आम भारतीयों को लिपि का ज्ञान नहीं है, इसलिए वे पढ़-लिख नहीं सकते। उसके समकालीनों ने तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, किन्तु आधुनिक भारतीय पंडों ने मिनांदर का खूब खंडन-मंडन किया। हकीकत तो यह है कि आज भी करोड़ों भारतीय मिनांदर की कसौटी पर खरा उतरते हैं। सदियों पुरानी इस अशिक्षा का परिणाम यह हुआ कि मूर्खता और मूर्खता के चलते अंधविश्वासों का बोझ मेरे पूर्वजों के सिर से कभी नहीं उतरा...।

       शुरुआत यदि दादा से ही करूं तो पिता जी के अनुसार उन्हें एक भूत ने लाठियों से पीट-पीटकर मार डाला था। अपने पांच भाइयों में पिता जी सबसे छोटे थे। घर में सभी का कहना था कि दादा जी, जिनका नाम जूठन था, गांव से थोड़ा सा दूर झाड़ियों वाले टीले के पास छोटे से खेत में मटर की फसल को देर रात जानवरों से बचाने के उद्देश्य से गए थे। मटर के खेत में उन्हें फली खाता एक साही नामक जानवर दिखाई दिया, क्योंकि रात उजाली थी। दादा जी ने अपनी लाठी से साही पर हमला बोल दिया। लाठी लगते ही साही रौद्र रूप धारण करते हुए अपने लम्बे-लम्बे कँटीले रोंगटों को फैलाकर अंतर्धान हो गया। घर वालों के अनुसार वह साही नहीं, बल्कि उस क्षेत्र का भूत था। इस प्रकरण के बाद दादा जी खेत से डरकर तुरंत घर आ गए। इस भूत का किस्सा सारे गांव में फैल गया। डरकर हर किसी ने उधर जाना बंद कर दिया। सभी कहने लगे कि भूत बदला अवश्य लेगा।

      इसी बीच दादा जी एक दिन खलिहान में रात को सोए हुए थे कि साही संतरित भूत लाठी लेकर आया और उसने दादा जी को पीट-पीटकर मार डाला। दादा जी को मैंने कभी देखा नहीं था, क्योंकि उनकी यह भुतही हत्या मेरे जन्म से अनेक वर्ष पूर्व हो चुकी थी। इस हत्या की गुत्थी मेरे लिए आज भी एक उलझी हुई पहेली बनी हुई है। तर्कसंगत तथ्य तो शायद यही होगा कि दादा जी की गांव के ही किसी अन्य व्यक्ति से अवश्य ही दुश्मनी रही होगी और उसने साही भूत का मनोवैज्ञानिक बहाना निर्मित कर उन्हें मार डाला हो। सच्चाई चाहे जो भी हो, इस भुतही प्रक्रिया ने मेरे खानदान के हर व्यक्ति को घनघोर अंधविश्वास के गर्त में धकेल दिया। परिणामस्वरूप घर में भूत बाबा की पूजा शुरू हो गई। घर में ओझाओं का बोलबाला हो गया। किसी को सिरदर्द होते ही ओझेती-सोखैती शुरू हो जाती थी। ऐसे भुतहे वातावरण में किसी शिशु का जन्म आजमगढ़ जिले के धरमपुर नामक गांव में। जुलाई, 1949 को हुआ हो तो उसकी विरासत कैसी होगी?

       जाहिर है, शैशव काल में ही मैं मूर्खताजन्य अंधविश्वासों के बोझ तले दब गया। मेरी दादी का नाम मुसड़िया था। वह सौ वर्ष से भी ज्यादा जिन्दा रही। उसके चेहरे तथा बाँहों से लटकते हुए चिचुके चमड़े उसकी लम्बी उम्र को प्रमाणित करते थे। गांव वालों का कहना था कि मेरी दादी ने कौआ का मांस खाया है, इसलिए यह मरती नहीं है। गांव में यह किंवदंती फैली हुई थी कि कौवे का मांस खाने वाला बहुत दिन तक जिन्दा रहता है। जो भी हो, दादी कहती थी कि महीने के किसी पक्ष के त्रयोदशी के दिन मेरे पिता जी का जन्म हुआ था, इसलिए उनका नाम तेरसी पड़ा। मेरी माता का नाम धीरजा था। मेरे पिता जी को मछली मारने में महारत हासिल थी। वे किसी भी जलस्रोत से बड़ी आसानी से मछलियां मार लाते थे। 'मछरमरवा' के रूप में उन्हे उस क्षेत्र में पौराणिक ख्याति मिली हुई थी। लोग कहीं भी मछली मारने जाते, वे पिता जी से प्रार्थना करते थे कि साथ चलकर वह पानी छू भर दें, बस मछली सबको मिल जाएगी। बाद में मेरी मां ने मुझे बताया कि जिस चारपाई पर मैं पैदा हुआ, उसके नीचे तुरंत पिता जी ने गांव स्थित पोखरी से एक जिन्दा मछली पकड़कर डाल दिया। यह एक प्रकार का टोटका था, जिसके अनुसार उनका विश्वास था कि मुझे भी बड़ा होने पर 'मछरमरवा' के रूप में पौराणिक ख्याति मिल सकेगी। सम्भवतः मेरे मां-बाप की सर्वोच्च आकांक्षाओं की पहुंच मुझे एक सिद्धहस्त 'मछरमरवा' के रूप में देखने तक ही सिमटकर रह गई थी। जाहिर है, एक दलित खेत मजदूर और मजदूरनी की आकांक्षां इससे ज्यादा और क्या हो सकती थी? मां ने यह भी बताया कि उसके कई बच्चे पहले पैदा हुए किन्तु थोड़ा बड़ा हो-होकर सबके सब मरते चले गए। इसलिए जब में पैदा हुआ, तो पिता जी मुझे अपनी गोद में लेकर गांव से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर एक शिव मंदिर, जिसे शेरपुर कुटी कहते थे, पहुंचे और मंदिर के महंत बाबा हरिहर दास से आशीर्वाद देने के लिए विनती की। बाबा हरिहर दास बड़े उदार पुरुष थे। उन्होंने मुझे जीवित रहने का आशीर्वाद देते हुए मेरा नाम तुलसी राम रखा। बाबा का कहना था कि तुलसी दास रामभक्त थे। अतः यह लड़का भी बड़ा होकर तुलसी राम के रूप में रामभक्त होगा। मुझे जीवित रखने की प्रक्रिया में पिता जी स्वयं एक कट्टर शिवभक्त हो गए। उन्होंने घर के पास एक नया पीपल का पेड़ लगाया और उसकी पूजा शुरू कर दी। शनिवार के दिन वे पीपल पर जल चढ़ाते और शाम को घी का दीया जलाते। वे शिव की प्रार्थना में जो कुछ बोलते, उसे सुनकर ऐसा लगता था कि मानो वे किसी से लगातार रो-रोकर बातें कर रहे हों। पिता जी के अनुसार, जैसे-जैसे पीपल बढ़ता गया, वैसे-वैसे मैं भी। इस बीच उस जर्जर बुढ़िया दादी का लगाव भी मुझसे बढ़ता गया।

       जब मैं तीन साल का हुआ, गांव में चेचक की महामारी आई। मेरे ऊपर उसका गहरा प्रकोप पड़ा। चेचक से मैं मरणासन्न हो गया। घर में स्थानीय ग्रामीण देवी-देवताओं की पूजा शुरू हो गई। उस समय गांव में दलितों के अलग देवी-देवता होते थे, जिनकी पूजा सवर्ण नहीं करते थे। हमारे गांव में भी 'चमरिया माई' और 'डीह बाबा' दो ऐसे ही देवी-देवता थे, जिनकी पूजा दलित करते थे। इन दोनों को तूअर तथा बकरे की बलि दी जाती थी। बलि के अलावा इन्हें 'हलवा-सोहारी' (पूड़ी), 'धार' तथा 'पुजौरा' भी चढ़ाया जाता था। एक लोटा पानी में कुछ जायफल, छुहारा, लौंग आदि मिला दिया जाता, जिसे 'धार' कहते थे। एक मुट्ठी जौ का आटा 'पुजौरा' कहलाता था। चमरिया माई का स्थान उसी मटर वाले भुतहे खेत के पास झाड़ियों वाले टीले पर था। वहां कुम्हार के आंवां में पके मिट्टी के कुछ हाथी और घोड़े रखे हुए थे। यही हाथी-घोड़े गांव के ब्राह्मणों के घरों के पास डीह बाबा के स्थान पर भी रखे हुए थे। जैसा कि अवगत है, घर वाले भूत की भी पूजा करते थे, किन्तु गांव में चमरिया माई या डीह बाबा की तरह उसका कोई स्थान निर्धारित नहीं था। गांव के दक्षिण-पश्चिम कोण की दिशा में थोड़ी दूर पर दौलताबाद नामक एक दूसरा गांव या, जिसके बाहर एक सुनसान जगह पर बहुत पुराना पीपल का विशाल पेड़ था। घर वालों के अनुसार वह भूत उसी पेड़ पर रहता था। अतः वहीं जाकर उसकी पूजा की जाती थी। चेचक निकलने पर मनौती के अनुसार देवी 'शीतला माई' की भी पूजा की जाती थी। शीतला माई का मोदर गांव से करीब बीस किलोमीटर पश्चिमोत्तर में निजामाबाद कस्बे के पास था। वहां साल में एक बार गांव के सारे दलित मिलकर जाते और शीतला माई को सूअर के बच्चे की बलि के अलावा 'हलवा-सोहारी' भी चढ़ाई जाती थी। शीतला माई को अति प्रसन्न रखने के लिए मंदिर में वेश्याओं का नृत्य भी कराया जाता था। ऐसी नृत्यांगनाएं मोंदर के पास बड़ी आसानी से मिल जाती थीं।

        मेरे ऊपर चेचक का प्रकोप इतना जबर्दस्त था कि जीवित रहने की उम्मीद घर बाले लगभग छोड़ चुके थे। उपरोक्त देवी-देवताओं की मनौती के अलावा कोई चिकित्सकीय इलाज किसी भी तरह सम्भव नहीं था; क्योंकि घर वाले घोर अंधविश्वास के कारण दवा लेने से हठ के साथ इनकार कर देते थे। वैसे भी उन दिनों चेचक लाइलाज बीमारी थी। घर वाले इसे शीतला माई का प्रकोप समझते थे। पास के गांव से एक ओझा आता और कभी भी स्पष्ट न होने वाले कथित मंत्रों को बड़बड़ाते तथा लौंग तोड़ते हुए झाड़-फूंक करता था। वह नीम के पेड़ की छोटी डाल तोड़कर पत्ते समेत पूरी देह पर फेरता रहता था। उधर मेरी बुढ़िया दादी, जो चमरिया माई की अटूट भक्तिन थी, कंडे की आग में घी डाल-डालकर 'जय चमरिया माई', 'जय चमरिया माई' की बार-बार रट लगाते हुए अगियारी करती रहती थी। दादी मेरी मां से ज्यादा रोती रहती थी। अंततोगत्वा चेचक की आवश्यक बीमारी वाली अवधि समाप्त होने के साथ मैं ठीक होने लगा। घर वाले अटूट विश्वास के साथ कहते कि उनकी पूजा-पाठ से जिन्दा बच गया। इस बीच विभिन्न मनौतियों में सूअरों, बकरों की बलि में भैंसा भी शामिल हो चुका था। मेरी जान तो बच गई, किन्तु चेचक का प्रकोप हटते ही मेरी पूरी देह पर गहरे गहरे घाव के दाग पड़ गए। विशेष रूप से मेरा चेहरा इन दागों का भंडारण क्षेत्र बन गया। गांव में लोहार अनाज से मिट्टी या कंकड़ निकालने के लिए लोहे की पतली चद्दर काटकर उसे बड़ी चलनी का रूप देते थे और उसकी पेंदी में पतली छेनी से सैकड़ों छेदकर देते थे, जिसे 'आखा' कहते थे। आखा की पेंदी का बाहरी हिस्सा छेनी के छेद से खुरदरा हो जाता था। मेरा चेहरा इसी आखा के बाहरी हिस्से जैसा हो गया था। इस पूरे प्रकरण में मेरे शेष जीवन पर अत्यंत दूरगामी प्रभाव डालने वाली घटना घटी-चेचक से मेरी दाईं आंख की रोशनी हमेशा के लिए विलुप्त हो गई। भारत के अंधविश्वासी समाज में ऐसे व्यक्ति 'अशुभ' की श्रेणी में हमेशा के लिए सूचीबद्ध हो जाते हैं। ऐसी श्रेणी में मेरा भी प्रवेश मात्र तीन साल की अवस्था में हो गया। अतः घर से लेकर बाहर तक सबके लिए मैं 'अपशकुन' बन गया।

         मेरे गांव में मेरे अलावा कई अन्य व्यक्ति भी अपशकुन की श्रेणी में आते थे। एक थे करीब अस्सी वर्ष के बूढ़े ब्राह्मण जंगू पांडे। वे जीवनपर्यन्त कुंआरे रह गए थे। उनका अपना कोई नहीं था। शाम के समय ये अकसर घूमते हुए दलित बस्ती में आ जाते थे। उनके आते ही विभिन्न परिवारों में खलबली मच जाती थी। नई नई बहुओं को लोग घर के अंदर ही रहने के लिए हिदायत देते रहते थे। लोगों का मानना था कि जंगू पांडे की निगाह पड़ते ही बहुओं का अनिष्ट हो जाएगा। सम्भवतः वे निर्वश हो जाएंगी। इस संदर्भ में एक घटना याद आने पर आज भी दुख की अनुभूति होती है। मेरे घर के पास एक आम के पेड़ में खूब बौर आए थे। अचानक जंगू पांडे आकर आम के बौरों को देखने लगे क्योंकि बौर बहुत अच्छे लग रहे थे। मेरे घर यालों ने कहना शुरू कर दिया कि जंगू पांडे की नजर लग गई। अब फल नहीं आएंगे। जबकि बाद में खूब फल आए। इसी तरह गांव की एक अन्य बुढ़िया ब्राह्मणी थी, जिसका नाम किसी को मालूम नहीं था। वह सिर्फ 'पंडिताइन' के रूप में जानी जाती थी। पंडिताइन निर्वंश विधवा थी। उन्हें भी लोग देखना पसंद नहीं करते थे। गांव भर के लोगों का कहना था कि पंडिताइन का सामना हो जाने से किसी काम में सफलता नहीं मिलेगी। किसी काम से जाते हुए यदि पांडे का सामना किसी से हो जाता, तो वह लौटकर घर वापस आ आता और थोड़ी देर तक ठहरकर अपशकुन मिटाता, फिर काम पर जाता। यद्यपि जंगू पांडे और वह पंडिताइन बेहद शराफत से बातें करते थे, फिर भी उन मान्यताओं के चलते वे बिना किसी कारण अपमानित होते रहते थे। तीन वर्ष के शैशव काल में जब 'अशुभ-अपशकुन' की श्रेणी में मेरा प्रवेश हुआ तो भारत की आजादी के पांच साल बीत चुके थे; अर्थात् सन् 1952 का साल अपनी चरणसीमा की ओर बढ़ रहा था। धीरे-धीरे मेरे मस्तिष्क में उस ग्रामीण परिवेश से उत्पन्न संवेदनाएं हिलने-डुलने लगीं।

       अपने पांच भाइयों में मेरे पिता जी सबसे छोटे थे। सभी का एक संयुक्त परिवार था, जिसमें छोटे-बड़े लगभग पचास व्यक्ति एक साथ रहते थे। पिता जी के बीच वाले भाई जो वरीयता क्रम में तीसरे नम्बर पर थे, अत्यंत क्रोधी एवं क्रूर पुरुष थे। अकारण कोई भी व्यक्ति उनकी भद्दी-भद्दी गालियों का शिकार बन जाता। उनके दो बेटे एकदम उन्हीं जैसे क्रूर थे। वे सभी मुझे अकसर 'कनवा-कनवा' कहकर पुकारते थे। घर में कई अन्य भी कभी-कभी ऐसा ही कहते थे, इसके अलावा यह कि कभी भी कोई वैसा कहने से मना नहीं कर पाता। यहां तक कि मेरी मां भी सिसकियां भरते हुए चुप रह जाया करती थी, जिसका कारण था उन व्यक्तियों का क्रूर व्यवहार ।

        मेरी दादी का मुझसे अटूट लगाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। मैं उस भारी-भरकम संयुक्त परिवार का सबसे छोटा सदस्य था। दादी रात को भी मुझे अपने पास सुलाती और हमेशा मेरे मुंह पर हाथ फेरते हुए चमरिया माई की विनती करती रहती। मैं जैसे-जैसे बड़ा होता गया, वैसे-वैसे मेरा अपशकुन और अपमान भी बृहद् होता गया, विशेष रूप में परिवार के अंदर। बाद में थोड़ा समझदार होने पर दादी ने बताया कि चेचक निकलने के पहले घर में सबसे छोटा होने के कारण परिवार के सभी सदस्यों में मुझे गोद में लेकर खेलाने की होड़ लगी रहती थी, किन्तु चेचक के बाद सब कुछ बदल गया। पिता जी के बीच वाले कटु हृदयी भाई का नाम नग्गर धा। वे यदि घर में किसी बात से नाराज होते तो तुरंत खाना-पीना छोड़ देते थे। एक तरह से वे गांधीवादी अनशन पर बैठे जाते। घर का कोई सदस्य उन्हें मनाने के लिए थाली में खाना तथा लोटे में पानी लेकर जाता, तो वह उनकी गालियों की बौछार से सराबोर हो जाता। वे तुरंत खाना समेत थाली को वहीं उलट देते और लोटे के प्रहार से थाली को चकनाचूर कर देते। उस समय घर-गांव में सबके पास कांसे या फूल नामक धातु की थालियां और लोटे हुआ करते थे, जो किसी भी तरह के प्रहार से खंड-खंड हो जाते। इस तरह उनकी हर नाराजगी का शिकार कम से कम एक थाली अवश्य हुआ करती थी। उनकी इस तुनकमिजाजी से न जाने कितनी थालियां अपना अस्तित्व खो चुकी थीं। उनसे हर कोई आतंकित रहता था। उनके दोनों बेटे भी सही अधों में इस आतंक के उत्तराधिकारी थे। ये बाप-बेटे जब कभी अच्छे मूड में होते, तो मुझे पास बुलाते और जिस आंख से मैं देख सकता था उसे हाथ से बंद करा-कराकर मेरे सामने अपनी उंगलियां फैलाकर गिनने के लिए कहते। ऐसी स्थिति में मुझे धुंधला-सा दिखाई पड़ता था जिसके सहारे मैं विभिन्न उंगलियों को गिनकर बता देता और वे प्रसन्न हो जाते। इस प्रसन्न मुद्रा में वे हमेशा शाबाशी के रूप में कहते : "कनवा बड़ा तेज हो।" उनकी उंगलियों को गिन-गिनकर मैं भी खूब प्रतन्न रहता। किन्तु जब थोड़ा और बड़ा हुआ, तब अनुभूति हुई कि जिस गिनती को सफलता से मैं अपने को महान गणितज्ञ समझकर खुश हो जाता था, वास्तव में यह मेरा उपहात होता था तथा वे अपने मनोरंजन के लिए मेरे साथ यह खेल खेलते थे। धीरे-धीरे यह खेल मुझे बुरा लगने लगा। अत्यंत मानसिक पीड़ा होती थी, किन्तु उत्त धुंधली गिनती से पीछा छुड़ा लेने की हिम्मत नहीं पड़ती। यह क्रम वर्षों तक चलता रहा। इस संदर्भ में मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इस धुंधली गिनती की परीक्षा से उत्पन्न पीड़ा मेरे जीवन की पहली मानसिक पीड़ा थी। अशुभ-अपशकुन वाली पीड़ा की अनुभूति कुछ देर से आई। इन्हीं पीड़ाओं में मेरा सारा बचपन विलुप्त हो गया और मैं अल्पायु में ही अत्यंत संवेदनशील बन गया।

       मेरे दादा-परदादा गांव के ब्राह्मण जमींदारों के खेतों पर बंधुवा मजदूर थे। उन जमींदारों ने ही कुछ खेत उन्हें दे दिया था। गांव के अन्य दलित भी उन्हीं जमींदारों के यहां हरवाही (हल चलाने का काम) करते थे। यह हरवाही पुश्त-दर-पुश्त चली आ रही थी। मेरे परिवार में पिता जी के अन्य चारों बड़े भाई हरवाही नहीं करते थे, क्योंकि उनके बड़े-बड़े कई बेटे थे, जिनमें से पांच आत्तनसोल की कोयला खदानों, कलकत्ता की जूट मिलों एवं लोहे के कारखाने में काम करते थे। किन्तु मेरे पिता जी को खानदानी हरवाही से कभी मुक्ति नहीं मिली। वे अकसर कहा करते थे कि यदि हरबाही छोड़ दूंगा तो 'ब्रह्महत्या' का पाप लगेगा। अत्यंत धर्माध होने के कारण वे हरवाही को अपना जन्मसिद्ध अधिकार एवं पवित्र कार्य समझते थे। मेरी मां भी उनके साथ मजदूरी करती थी। हमारा संयुक्त परिवार एक अजायबघर की तरह था, जिसमें तरह-तरह के लोग अलग-अलग तौर-तरीकों के साथ रहते थे। पिता जी के सबसे बड़े भाई. जिनका नाम सोम्मर था, बारह गांवों के चमारों के चौधरी चुने गए छ। भारत की आजादी के पूर्व न जाने कब से पूर्वी उत्तर प्रदेश के अनेक क्षेत्रों की एक परम्परा के अनुसार चमारों का 'बारहगांवा' होता था, अर्थात् बारह गांव के चमारों की एक बृहद् पंचायत होती थी, जिसमें कोई एक व्यक्ति सर्वसम्मति से चौधरी चुना जाता था। इस चौधरी को व्यावहारिक रूप में एक न्यायाधीश की तरह अधिकार प्राप्त होता था। 'बारहगांवा' के चमार अपने किसी भी आपसी झगड़े के निपटारे के लिए चौधरी के पास आते, फिर पंचायत बुलाई जाती, जिसमें घंटों की माथापच्ची के बाद चौधरी अपना अंतिम फैसला देते, जो तुरंत सभी को मान्य हो जाता था।
बारहगांवा के चौधरी के समक्ष जो समस्याएं लाई जातीं, उनमें दो मामले बड़े विचित्र ढंग से सुलझाए जाते थे। इनमें से एक मामला होता था किसी युवती का गांव के किसी अन्य व्यक्ति के साथ यौन संबंध या उसका बिन विवाह गर्भवती हो जाना तथा दूसरा था किसी चमार द्वारा मरे हुए पशु (गाय, बैल या भैंस) का मांस खाया जाना। मरे हुए पशु का मांस खाने के संदर्भ में एक उल्लेखनीय तथ्य यह है कि आजादी के पूर्व हमारे क्षेत्र के सभी चमार गाय, बैल तथा भैंस मर जाने पर उसका मांस खा जाते थे। मेरी बुढ़िया दादी अकसर मुझे सोते समय अपनी युवा अवस्था के अनेक संस्मरण सुनाया करती थी, जो अत्यंत रोचक एवं चमत्कारक हुआ करते थे। दादी के ये संस्मरण उसकी शतकीय उम्र को देखते हुए सम्भवतः सन् 1860 या 70 के दशक के मालूम पड़ते हैं। मैं इन संस्मरणों को बहुत ध्यान से सुनता था। एक ऐसे ही संस्मरण में दादी ने बताया कि जब वह ब्याह कर हमारे गांव आई तो देखा कि गांव में किसी की गाय, भैंस या बैल मर जाता तो पास स्थित जंगल में ले जाकर उसका चमड़ा निकाला जाता फिर उसके बाद गंड़ासे और कुल्हाड़ियों से काट-काटकर उसका मांस सारे दलित बांस से बनी हुई टोकरियों में भरकर घर लाते । मांस काटने का काम प्रायः महिलाएं करती थीं। दादी यह भी बताती कि जिस समय कोई चमार पुरुष मरे हुए जानवर का चमड़ा निकालना शुरू करता, अचानक सैकड़ों की संख्या में वहां गिद्ध मंडराने लगते तथा दर्जनों कुत्ते आकर भौंकने लगते थे। कुछ सियार भी चक्कर मारते किन्तु कुत्तों और महिलाओं की उपस्थिति को देखते हुए वे पास नहीं आ पाते। मरे पशु के मांस के बंदरबांट में महिलाओं के साथ कुत्तों और गिद्धों में उग्र होड़ मच जाती थी। दादी भी इस होड़ में शामिल हुआ करती थी। दादी मांस के कुछ हिस्से को आवश्यकतानुसार तुरंत पकाती किन्तु अधिकांश बचे हुए कच्चे मांस को कई दिन तक तेज धूप में सुखाती। खूब सूख जाने पर मांस को कच्ची मिट्टी से बनी कोठिली में रखकर बंद कर देती। इस प्रक्रिया से सूखे मांस का भंडारण बढ़ता जाता और साल के उन महीनों में जब खाने की वस्तुओं का टोटा पड़ जाता तो सूखे मांस को नए तरीके से पका-पकाकर परिवार के लोग अपना पेट भरते ।  हुए इन पशुओं के मांस को 'डांगर' कहा जाता था।

      आजादी के बाद चमारों ने डांगर खाना बंद करने का अभियान चलाया, जो अत्यंत सफल रहा। स्मरण रहे कि यह अभियान मूल रूप से बाबा साहेब अम्बेडकर ने चलाया था किन्तु हमारे बारहगांवा में उन्हें कोई नहीं जानता था, बल्कि जगजीवन राम काफी लोकप्रिय थे। डांगर विरोधी अभियान की सफलता के बावजूद किसी-किसी गांव में कई एक चोरी-छिपे डांगर लाकर खाया करते थे। किन्तु पकड़ लिये जाने पर उनका मामला चौधरी के पास लाया जाता था। मेरे सबसे बड़े सोम्मर चाचा आजादी के पूर्व कभी चौधरी चुने गए थे। वे बड़े तर्कबाज बातूनी थे, इसलिए जीवनपर्यन्त चौधरी बने रहे। उनकी बातों में दम होता था, साथ ही निष्पक्षता भी, जिसके कारण उन्हें बदल देने की आवाज बारहगांवा में कभी नहीं उठी। बारहगांवा से किसी भी मामले के आने के बाद बुलाई गई पंचायत हमारे घर के सामने स्थित कुएं के काफी बड़े चबूतरे पर बैठकर की जाती थी। पंचायत में बारहों गांव के प्रतिनिधि आते थे, जिसके कारण भारी-भरकम भीड़ हो जाती थी। पंचायत शुरू होते ही गांजा तथा हुक्का पीने का लम्बा दौर चालू हो जाता था। स्वयं हमारे परिवार के दस लोग आला दर्जे के गंजेड़ी थे। शाम के समय सभी गांजा पीते और मुझे बार-बार पुआल की रस्सी की बड़ी-सी गांठ बनाकर, उसे जलाना पड़ता। जब जलकर वह लाल हो जाती तो उस धधकती आग को गांजे से भरी चिलम के ऊपर रखना पड़ता था। लगभग पांच साल की उम्र से ही रस्सी की गांठ जलाने की मेरी नौकरी पक्की हो गई थी। इस काम से मुझे बड़ी नफरत थी किन्तु मजबूरी में करना पड़ता था। नफरत का सबसे बड़ा कारण था, किसी भी प्रकार के धुएं से मेरा दम घुटता था। मेरे बड़े होने पर इसकी पहचान एक एलर्जी के रूप में की गई। पंचायत के दिन रस्सी जलाने की ड्यूटी बड़ी लम्बी हो जाती थी। इस ड्यूटी के कारण मैं मजबूरी में पूरी पंचायत खत्म होने तक उसकी कार्यवाही देखता-सुनता रहता।
जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि यौन संबंध तथा डांगर खाने के मामले पंचायत द्वारा बड़े विचित्र ढंग से सुलाझाए जाते थे। यौन संबंध से जुड़ी युवती के पूरे परिवार को 'कुजाति' घोषित कर दिया जाता था। कुजाति का मतलब होता था, उसका हुक्का-पानी बंद अर्थात् सम्पूर्ण रूप से बारहगांवा द्वारा बहिष्कार। उस परिवार से कोई बात तक नहीं कर सकता था। 'कुजाति' की घोषणा बड़े ही विचित्र ढंग से की जाती थी। बारहगांवा में अकसर किसी न किसी के घर शादी-विवाह आदि. जैसे पर्व के अवसर पर सामूहिक भोज हुआ करता था। ऐसे किसी भोज में 'कुजाति' किये जाने वाले व्यक्ति को निमंत्रित किया जाता और जब सभी के साथ वह खाने के लिए कतार में बैठता तो सबके साथ पत्तल में उसे भी खाना परोसा जाता। लेकिन ज्यों ही वह व्यक्ति खाना हाथ में लेकर मुंह की ओर बढ़ाता, तुरंत एक अन्य व्यक्ति उत्तका हाथ पकड़ लेता। फिर सभी एक साथ बोलते कि उसे 'कुजाति' घोषित कर दिया गया है, इसलिए वह नहीं खा सकता। कुजाति घोषित होने के बाद वह आदमी अपमानित होकर वहां से अपने घर वापस लौट जाता था। इस तरह उसका बहिष्कार शुरू हो जाता था। बाद में जब कभी कुजाति किया हुआ व्यक्ति बिरादरी में वापस आना चाहता तो वह बारहगांवा से अपील करता। पंचायत फिर बुलाई जाती और दंडस्वरूप उसे पूरे ग्राम समाज को सूअर-भात खिलाने का दिन तय किया जाता। इस बीच यदि अवैध यौन संबंध के चलते वह युवती गर्भवती रहती तो उसका गर्भपात स्वयं गांव की महिलाएं, जो बच्चा पैदा करवाने में अनुभवी होती थीं, पेट दबा-दबाकर अत्यंत क्रूर ढंग से करवा देती थीं। फिर भोज के निर्धारित दिन सूअर-भात पंचों को परोसने के समय चौधरी की अनुमति से युवती के ऊपर गंगाजल छिड़ककर उसे पवित्र घोषित कर दिया जाता था। इसके बाद कुजाति परिवार के पाप को माफ करने के लिए भोज में उपस्थित पंचों से अपील की जाती। सभी पंच एक साथ जोर का नारा लगाते : 'बोला बोला सीताराम' इसके बाद वे कहते कि पाप माफ कर दिया गया। इसके साथ ही वह परिवार-बिरादरी में वापस आ जाता था। डांगर खाने वालों के साथ भी यही दंड विधान अपनाया जाता था। छोटे-मोटे झगड़ों के निपटारे के लिए दोषी व्यक्ति को दंडस्वरूप विवाह आदि जैसे अवसरों पर बिछाई जाने वाली बड़ी दरी तथा खाना पकाने के लिए बड़े-बड़े कांसे या पीतल के हंडे ग्राम समाज को देने के लिए कहा जाता। ऐसे सामान चौधरी या किसी अन्य व्यक्ति के घर पर रख दिए जाते थे और अवसर आने पर कोई भी व्यक्ति उसका उपयोग कर सकता था। पर्व बीत जाने पर सामानों को वापस कर दिया जाता था। सन् 1950 के दशक में ऐसी पंचायतों का दलितों के बीच काफी बोलबाला था, किन्तु 1960 के दशक से धीरे-धीरे ये परम्पराएं विलुप्त होने लगीं। आज के जमाने में न वैसे चौधरी रहे और न वैसी पंचायतों के नामोनिशान ।

        पिता जी के दूसरे नम्बर वाले भाई का नाम मुनेस्सर तथा तीसरे वही गुस्सैल नग्गर। ये दोनों उत्तर प्रदेश में प्रचलित प्रसिद्ध 'शिवनारायण पंथ' के 'धर्मगुरु' थे। इन दोनों 'गुरुओं' के दर्जनों अलग-अलग चेले थे, जो दूर-दूर के गांवों में फैले हुए थे। संयोगवश अपने गांव का कोई भी व्यक्ति इनका चेला नहीं था। मुनेस्सर चाचा कलकत्ता की एक जूट मिल में नौकरी करते थे। अतः उनके दर्जनों चेले वहां भी थे, जो मूलतः उत्तर प्रदेश के ही रहने वाले थे। शिवनारायण पंथ के ये चेले जब भी अपने इन गुरुओं से मिलते, उनके नमस्कार करने का एक विचित्र तरीका होता था। वे सिर पर पहले पगड़ी बांधते और फिर गुरु के सामने घुटना मोड़कर उकडूं बैठ जाते। फिर दोनों हाथ एक साथ सटा हुआ फैलाकर गुरु के पैरों पर रख देते थे। वे अपने सिर को दाएं-बाएं यौगिक मुद्रा में घुमाने के बाद पैरों पर ही झुकाकर जोर से बोलते, 'वन्दगी साहेब'। ये गुरु जब कभी चेलों के घर जाते, तो थाली में उनका पैर धोकर उस गंदे पानी को चेले पी जाते थे। हमारे घर में शिवनारायण पंच की परम्परा में साल में तीन अवसरों पर समारोह होता, जिसमें बड़ी संख्या में चेले उपस्थित होते। ये तीन अवसर होली, दीवाली तथा कृष्णजन्माष्टमी के दिन आते। इन समारोहों को 'गादी लगाना' कहा जाता था। लकड़ी की बनी छोटी मेज के बराबर छोटे पैरों वाली एक चौकी रख दी जाती। उस पर साफ कपड़ा बिछाकर सुविधानुसार उपलब्ध किसी भी देवी-देवता का शीशे में मढ़ा हुआ फोटो रख दिया जाता था। ढेर सारी अगरबत्तियां भी जलाकर रखी जातीं। यद्यपि हमारे परिवार में कोई पढ़ा-लिखा नहीं था किन्तु घर में न जाने किस भाषा में लिखी हुई एक हस्तलिखित पांडुलिपि लाल कपड़े में रखी हुई थी, जिसे 'अन्यास' कहा जाता था। इस पांडुलिपि को कोई व्यक्ति छू तक नहीं सकता था। इस रहस्यमय अन्यास को भी चौकी पर रख दिया जाता। इसी को गादी लगाना कहा जाता था। गादी लगाते ही चौकी के चारों तरफ गुरु समेत चेले तन्मय होकर बैठ जाते। इसके बाद ढोल, खंजीरा तथा अन्य वाद्य यंत्रों के साथ रात भर शिवनारायण के भजन गाये जाते। बीच-बीच में कबीर के भी भजन गाये जाते थे। साथ ही एक बड़े कड़ाहे में दूध, घी, सूजी, गुड़ तथा किशमिश आदि के मिश्रण से ढेर सारा प्रसाद पकाया जाता, जिसका वितरण गादी समाप्त होने पर किया जाता। किसी शिवनारायण पंथी की मृत्यु हो जाने पर हिन्दुओं की तरह उसकी लाश को जलाया नहीं जाता, बल्कि मुसलमानों की तरह दफनाया जाता था। किसी-किसी को गंगा नदी में बहा भी दिया जाता था। मृतकों के अंतिम संस्कार की एक विशेष बात यह होती थी कि लाश को घर से कब्रिस्तान तक ले जाते समय शवयात्री ढोल-मंजीरा के साथ भजन भजन गाते हुए चलते थे तथा रास्ते में पांच जगह लाश को जमीन पर रखकर एक विशेष भजन गाया जाता जिसे 'परवाना' कहते थे। 

      दफनाते समय भजन गायकी तथा वाद्य यंत्रों की रफ्तार बेहद तेज हो जाती थी। तारे शवयात्री मृत्यु के तीसरे दिन मृतक के घर इकट्ठा होते और भाड़ में भुने हुए गेहूं का दाना खाकर शरबत पीते। गेहूं के दाने को 'बहुरी' कहा जाता था। 'बहुरी' के संदर्भ में एक रोचक तथ्य यह है कि गांव की दलित महिलाएं आपस में झगड़ा करते समय एक दूसरे के बेटे, पिता, पति या किसी अन्य की 'बहुरी भुजाने' का शाप देतीं, तो इसे बहुत बुरा माना जाता था। जाहिर है 'बहुरी भुजाने' का मतलब होता था विपक्षी के सगे-संबंधियों की मृत्यु कामना। बाद में मृत्यु के तेरहवें दिन 'तेरही' के अवसर पर बहुत बड़ा मृत्युभोज होता था। शिवनारायण पंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके संस्थापक शिवनारायण स्वयं उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के एक क्षत्रिय थे, किन्तु उनके अनुयायी सिर्फ दलित जाति के लोग बने।, सिर्फ दलितों में इस पंथ का प्रचलन अपने आपमें एक रहस्यमय तथ्य है। शिवनारायण पंथी बन जाने पर उस व्यक्ति को 'गुरुमुख' कहा जाता था।पिता जी के चौथे बड़े भाई का नाम मुन्नर था। वे चौधरी चाचा या दोनों शिवनारायण पंधी गुरु चाचाओं से बिल्कुल भिन्न एक समन्वयवादी किस्म के व्यक्ति थे। इसी विशेषता के कारण उन्हें परिवार का मालिक बनाया गया था। घर में जो कुछ सम्पदा थी, उसका वे हिसाब-किताब रखते थे। मुन्नर चाचा भूत-पिशाच में बहुत विश्वास करते थे। वे दादी की तरह चमरिया माई के भक्त थे। साल में गर्मी के दिनों में गांव भर के दलित मिलकर चमरिया माई तथा डीह बाबा की 'पुजैया' करते। यह पुजैया आम पूजा से भिन्न होती थी।

      हर साल पुजैया के आयोजन में मुन्नर चाचा की नेतृत्वकारी भूमिका होती थी। वे गांव भर के लोगों से पुजैया के लिए अंशदान इकट्ठा करते। रात के समय सोता पड़ने के बाद गांव के बाहर मैदान में लोग इकट्ठा होकर बड़े-बड़े घड़ों में धार बनाते तथा इस अवसर पर किसी न किसी ओझा या तांत्रिक को अवश्य बुलाया जाता। ओझा लौंग तोड़-तोड़कर विभिन्न देवियों का नाम लेकर हिचक-हिचककर विचित्र-विचित्र शब्द ध्वनि निकालता। यह क्रम घंटों रात के सन्नाटे में चलता रहता। धार से भरे हुए घड़ों के पास लाल कपड़े की अनेक झंडियां भी रखी जाती थीं। साथ में गोल आकृति का एक बड़ा भतुआ (एक प्रकार का कट्टू) रखा जाता। भतुआ अंदर से बिल्कुल लाल रंग का होता था। काटने पर ऐसा लगता था कि मानो खून से लथपथ हो। ओझा द्वारा ओझैती समाप्त होने पर मुन्नर चाचा के नेतृत्व में धार से भरे घड़ों को उठाकर कंधे पर रख लिया जाता। झंडियां पकड़ ली जातीं। चाचा भतुआ लेकर सबके आगे चलते तथा 'चमरिया माई एवं डीह बाबा की जय' के सर्वाधिक जोर से लगाए जाने वाले नारों के साथ लोग दूसरे गांव की सीमा में ऐसी जगह पहुंचते, जहां एक रास्ता दूसरे रास्ते को काटता था। वहां पर सबसे पहले भतुआ को पटककर चकनाचूर कर दिया जाता तथा वह धार भी गिरा दी जाती और झंडियां गाड़ दी जातीं। इसके बाद लोग चुपके से घर वापस आ जाते। पुजैया में भतुआ का तोड़ा जाना सम्भवतः नरबलि का प्रतीक होता था। इस सालाना पुजैया के पीछे गांव वालों का अटूट विश्वास था कि अगले साल गांव में कोई बीमारी या अन्य आपदा नहीं आएगी।

     पुजैया के दूसरे दिन दलित बस्ती के सभी लोग मिलकर एक बहुत बड़ा सूअर खरीदकर लाते थे और उसकी बलि चढ़ाई जाती थी। सूअर खरीदने की प्रक्रिया बड़ी रोचक होती थी। सूअर पालने वाले दूर-दूर के गांवों में रहते थे। साधारणतया दलितों में पासी जाति के लोग सूअर पालते थे। हमारे गांव में कोई पासी नहीं रहता था। किसी-किसी गांव में एक या दो घर पासियों के होते थे। सूअरों को रखने के लिए दत्त से पंद्रह फीट का लम्बा-चौड़ा, दो फीट गहरा चौकोर गड्ढा खोदकर किनारे-किनारे चार या पांच फीट की ऊंची दीवार खडी की जाती तथा उसके ऊपर गन्ने की पत्ती से बनी मड़ई टांग दी जाती। इस मड़ई का प्रवेशद्वार बहुत संकरा तथा कमरे के अंदर की ओर छिछला होता था। इस निवास को 'खोभार' कहते थे, जिसमें पंद्रह-बीस सूअर रहते थे। ये सूअर रात के समय ही 'खोभार' में आते थे। अन्यया वे गांव के आस-पास इधर-उधर भोजन की तलाश में भटकते रहते थे। इसलिए सूअर खरीदने वाले भी दौड़ते हुए सूअरों का पीछा करते हुए उनमें से किसी एक को पसंद करते थे। पसंद करने के बाद कीमत तय हो जाने पर उसे पकड़ने के लिए लम्बी-लम्बी सामूहिक मैराथन दौड़ लगानी पड़ती थी। कभी-कभी सूअर घंटों भागता रहता था। दौड़ भी उतनी देर जारी रहती थी। अंततः उसे घेरकर मुश्किल से काबू में किया जाता था।

       पकड़ने के बाद सूअर के चारों पैरों को मोटी रस्सी से एक साथ बांध दिया जाता था। फिर एक मोटे बांस की काड़ी में लटकाकर दो-दो आदमी आगे-पीछे जिस तरह डोली कहार उठाते हैं, वैसे उठाकर अपने गांव लाते थे। जिस तरह उस जमाने में सवर्ण घरों की कन्याएं विवाह के बाद विदा होकर डोली में बैठकर ससुराल जाते समय रोती-चिल्लाती तथा रुदन गायकी करती रहती थीं, ये सूअर भी वैसे ही मानव कंधों पर काड़ी में बंधे तथा उल्टे लटके हुए रास्ते भर चिल्लाते रहते थे। सूअर की बलि या उसे मारने का तरीका बहुत अमानवीय होता था। सूअर को जमीन पर लेटाकर उसकी गर्दन तथा कमर के ऊपर बांस की काड़ी रखकर चार-चार आदमी जोर से दबाये रहते, फिर एक आदमी द्वारा लगभग दो फीट लम्बी अत्यंत नुकीली लोहे की सरिया जिसे 'हिकना' कहते थे, उसके सीने में भोंक दिया जाता था। सरिया भोंकते समय सूअर बड़ी तेज आवाज में चिल्लाना शुरू कर देता था। उसकी यह आवाज मीलों दूर तक सुनाई देती थी। सूअर की चिल्लाहट के साथ ही चमरिया माई तथा डीह बाबा की जयकार भी होती रहती थी। सूअर के मरते ही 'हिकना' को सीने ते निकाल लिया जाता और उसके गहरे घाव में उतना ही बड़ा अरहर का डंडा जिसको 'रहट्ठा' कहा जाता था, घुसेड़ दिया जाता, ताकि खून बाहर न निकले। मृत सूअर के बाल उखाड़ने के बाद उसे गन्ने की पत्ती जलाकर खूब भूना जाता था, ताकि उसके चमड़े में घुसे बालों की जड़ें समाप्त हो जाएं। इसके बाद सूअर की पूंछ के पास का पूंछ समेत करीब एक किलो का मांस का बड़ा टुकड़ा सबसे पहले काटकर निकाल लिया जाता था। इस पूरे टुकड़े को पूंछ ही कहा जाता था, जिसे हमारे बारहगांवा के चौधरी चाचा को समर्पित किया जाता था। गांव में जब भी सूअर की बलि या विना बलि वाला सूअर मारा जाता, यह एक किलो की पूंछ चौधरी के नाम पर हमारे परिवार को मुफ्त में मिलती थी। बाकी मांस आवश्यकतानुसार हर परिवार पैसे से खरीदता था। सूअर की पूंछ चौधरी चाचा की बारह गांवों में विशिष्ट प्रतिष्ठा और उनकी न्यायायिक भूमिका की मान्यता का प्रतीक थी। यह परम्परा चौधरी चाचा के जीवनपर्यन्त जारी रही।
     
     इस तरह हमारा परिवार संयुक्त रूप से बृहद् होने के साथ-साथ वास्तव में एक अजायबघर ही था, जिसमें भूत-प्रेत, देवी-देवता, सम्पन्नता-विपन्नता, शकुन-अपशकुन, मान-अपमान, न्याय-अन्याय, सत्य-असत्य, ईर्ष्या-द्वेष, सुख-दुख आदि-आदि सब कुछ था, किन्तु शिक्षा कभी नहीं थी।
   
उन्हीं दिनों हमारे सदियों पुराने खानदान में एक युगांतरकारी घटना हुई। मैं लगभग पांच साल का हो चुका था। यह सन् 1954 की बात है। हमारे परिवार के जो लोग आसनसोल और कलकत्ता में खानों और मिलों में काम करते थे, कभी-कभी पोस्टकार्ड पर चिट्ठियां भेजा करते थे। हमारी दलित बस्ती में कोई पढ़ा-लिखा नहीं था। गांव में ब्राह्मण ही पढ़े-लिखे थे। वे अकसर दलितों की चिट्ठियां पढ़ने में आनाकानी करते तथा पढ़ने के पहले अपमानजनक बातें सुनाते। इस व्यवहार से ऊबकर घर वालों की कृपा दृष्टि सबसे छोटा बालक होने के कारण मेरे ऊपर पड़ी। परिणामस्वरूप पूर्वोक्त शिव मंदिर के पास स्थित प्राइमरी स्कूल में मुझे चिट्ठी पढ़ने लायक बनाने के उद्देश्य से भेजा जाने लगा।

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